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बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. राज्यपाल फागू चौहान से मुलाक़ात कर उन्होंने इस्तीफा सौंपा- नीतीश कुमार

नई दिल्ली, 10 अगस्त 2022 (यूटीएन)। जीतनराम मांझी को अगर छोड़ दिया जाए तो क़रीब नीतीश कुमार 17 साल तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं. साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी से गठबंधन तोड़कर नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव अकेले लड़े लेकिन उन्हें क़रारी हार का सामना करना पड़ा. मई 2014 में सीएम पद छोड़ने वाले नीतीश कुमार ने फ़रवरी 2015 में जीतनराम मांझी को पार्टी से निकालकर खुद 130 विधायकों के साथ राजभवन पहुंचे और सरकार बनाने का दावा पेश किया. इसके ठीक बाद विधानसभा चुनाव में लालू के 15 साल के शासन के ख़िलाफ़ लड़कर सत्ता में आने वाले नीतीश कुमार ने ये समझ लिया कि बिना गठबंधन बिहार में सरकार बनना संभव नहीं है और यहीं से साथ आए जेपी और कर्पूरी ठाकुर के सानिध्य में राजनीति सीखने वाले लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक साथ.
बिहार में दोनों नेताओं के ‘सामाजिक न्याय के साथ विकास’ के नारे ने राज्य में बीजेपी के ‘विकास’ के नारे को पटखनी दे दी. लेकिन 27 जुलाई 2017 को पटना में राजनीतिक सरगर्मी तब बढ़ गई.
नीतीश कुमार राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी से मिलने राजभवन पहुंचे और अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया. नीतीश ने ये इस्तीफ़ा राज्य के तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद दिया था, और उन आरोपों को ही इस्तीफ़े की वजह बताया था. इसके ठीक बाद नीतीश कुमार उस बीजेपी के साथ सत्ता में आए जिसके लिए भरे सदन उन्होंने कहा था- ‘मिट्टी में मिल जाऊंगा लेकिन भाजपा के साथ नहीं जाऊंगा.’ अब नीतीश कुमार एक बार फिर राजद के साथ आ गए हैं. राजनीति समीकरणों और संभावनाओं का खेल है. और इसी तथ्य को साबित करते हुए वो नीतीश कुमार, जो नरेंद्र मोदी की “सांप्रदायिक छवि” से कतराते रहे, उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए मंच से वोट मांगे और साल 2020 के विधानसभा में पीएम नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार के लिए वोट मांगे.
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफ़र कई उतार-चढ़ाव से होकर गुज़रा है. इस सफ़र पर एक नज़र…
*इंजीनियर बाबू से सुशासन बाबू तक*
पटना शहर से सटे बख्तियारपुर में 1 मार्च 1951 को नीतीश कुमार का जन्म हुआ. नीतीश कुमार ने बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई और इस दौरान वो इंजीनियर बाबू के नाम से भी जाने जाते थे.नीतीश कुमार जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन से निकले वाले नेता हैं जो बिहार की सत्ता में डेढ़ दशक तक केंद्र में रहे. इंजीनियरिंग कॉलेज में ही उनके दोस्त और क्लासमेट रहे अरुण सिन्हा ने अपनी किताब ‘नीतीश कुमारः द राइज़ ऑफ़ बिहार’ में लिखा है कि कॉलेज के दिनों में नीतीश कुमार राज कपूर की फ़िल्मों के दीवाने थे, वो इस क़दर ये फ़िल्में देखते थे कि वे इस बारे में दोस्तों की हँसी-ठिठोली भी बर्दाश्त नहीं करते थे. नीतीश कुमार को 150 रुपये की स्कॉलरशिप मिला करती थी जिससे वो हर महीने किताबें-मैगज़ीन खरीद लाते, ये वो चीज़ें होतीं जो उस वक़्त के अन्य बिहारी छात्रों के लिए सपने जैसी थीं लेकिन स्वतंत्रता सेनानी के बेटे नीतीश का झुकाव हमेशा राजनीति की ओर रहा.
लालू प्रसाद यादव और जार्ज फ़र्नांडिस की छाया में राजनीति की शुरुआत करने वाले नीतीश कुमार ने राजनीति में 46 साल का लंबा रास्ता तय कर लिया है. जब 1995 में समता पार्टी को महज सात सीटें मिली तो नीतीश कुमार ने ये समझ लिया कि राज्य में तीन पार्टियां अलग-अलग लड़ाई नहीं लड़ सकतीं. इस तरह 1996 में नीतीश कुमार ने बीजेपी से गठबंधन किया. इस वक़्त लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों में नेतृत्व हुआ करता था. इस गठबंधन का नीतीश कुमार को फ़ायदा हुआ और साल 2000 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बने, हालांकि ये पद उन्हें महज़ सात दिन के लिए ही मिला, लेकिन वे अपने-आपको लालू यादव के ख़िलाफ़ एक ठोस विकल्प बनाने में कामयाब रहे.
महादलितों की पॉलिटिक्स लाइन 2007 में नीतीश कुमार ने दलितों में भी सबसे ज़्यादा पिछड़ी जातियों के लिए ‘महादलित’ कैटेगरी बनाई. इनके लिए सरकारी योजनाएं लाई गईं. 2010 में घर, पढ़ाई के लिए लोन, स्कूली पोशाक देने की योजनाएं लाई गईं.
आज बिहार में सभी दलित जातियों को महादलित की कैटेगरी में डाला जा चुका है. साल 2018 में पासवानों को भी महादलित का दर्जा दे दिया गया. यूं तो बिहार में दलितों के सबसे बड़े नेता रामविलास पासवान हुए लेकिन जानकार कहते हैं कि दलितों के लिए ठोस काम नीतीश कुमार ने किया है. नीतीश ख़ुद 4 प्रतिशत आबादी वाली कुर्मी जाति से आते हैं, लेकिन सत्ता में रहते हुए उन्होंने हमेशा उस पार्टी के साथ गठबंधन में ही चुनाव लड़ा जिनके पास ठोस जाति-वर्ग का वोटर रहा हो. चाहे वह बीजेपी के साथ लड़ा गया चुनाव हो, जहां बीजेपी समर्थक माने जाने वाले सवर्ण वोटरों का साथ उन्हें मिला या फिर 2015 में यादव-मुस्लिम आधार वाली आरजेडी के साथ चुनाव हो.
विनम्र और सौम्य छवि वाले नीतीश कुमार राजनीति के मामले में उतने ही निर्मम हो सकते हैं जितने बाकी राजनेता. इस बारे में मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “उन्होंने शरद यादव और जॉर्ज फ़र्नांडीज़ के साथ क्या किया ये सबको पता है, ज़ॉर्ज के आखिरी दिन कैसे बीते ये किसी से छिपा नहीं है.” नीतीश कुमार की पार्टी के पास कोई भी संस्थागत ढांचा नहीं है, लेकिन ये नीतीश कुमार की राजनीतिक कुशलता ही रही कि वह राज्य में वोट बेस और कार्यकर्ताओं वाली पार्टियों को किनारे लगाकर 15 साल तक सत्ता का केंद्र बने रहे.
रिपोर्टर- प्रदीप जैन |

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