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भारत के सबसे कम उम्र और कम वजन के बच्चे पर ‘स्पेशल एंडोस्कोपिक प्रोसीजर’ द्वारा बंद खाने की नली को खोला गया

नई दिल्ली, 27 जुलाई 2022 (यू.टी.एन.)। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी इस 6 साल और 11 किलो की सबसे कम उम्र और कम वजन हमारे अनुसार, भारत में सबसे कम उम्र एवं सबसे कम वजन के बच्चे में से एक पर पीओईएम इंडोस्कोपिक प्रोसीजर का सफल प्रयोग वाली इस बच्ची में ‘स्पेशल एंडोस्कोपिक प्रोसीजर’ को करना । इतनी कमजोर और कम वजन की बच्ची में संक्रमण और सांस की समस्या का सबसे अधिक जोखिम था। पी.ओ.ई.एम.प्रोसीजर में इस्तेमाल होने वाले वयस्क एंडोस्कोपिक और सहायक उपकरण का उपयोग एक छोटे बच्चे  में करना एक जटिल कार्य था।” …….. प्रो. (डॉ.) अनिल अरोड़ा हाल ही में सर गंगा राम अस्पताल के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डिपार्टमेंट में एक 6 साल की बच्ची इलाज के लिए पहुंची, जो लगभग 3 साल से खाना निगल नहीं पा रही थी । उसे बार-बार उल्टियां होने की समस्या से ग्रसित थी और उसके मुंह और नाक से भोजन की उल्टियां  हो रही थी, जिसके परिणामस्वरूप उसका वजन काफी कम हो गया था।
*डॉ. (प्रो.) अनिल अरोड़ा, चेयरमैन, इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड पैन्क्रियाटिकोबिलरी साइंसेज, सर गंगा राम अस्पताल के अनुसार,* “जब वह हमारे पास आई तो वह बहुत पतली, कमजोर और मैरास्मिक (प्रोटीन कुपोषण) थी और उसका वजन उसकी उम्र के सामान्य वजन से 8-10 किलोग्राम कम था। एंडोस्कोपी, बेरियमस्वॉलो और उसके बाद हाई रेजोल्यूशन एसोफैगलमैनोमेट्री के साथ मूल्यांकन करने के बाद हमने पता लगाया कि वह ऐकलेज़िया कार्डिया (खाना निगलने की बीमारी) से पीड़ित है।“
इतनी कम उम्र के बच्चों में ऐकलेज़िया कार्डिया का उपचार सर्जिकल इंटरवेंशन होता है, लेकिन उसकी तुलना में हमने इस बच्ची में पेर ओरलएंडोस्कोपिक मायोटॉमी नामक एंडोस्कोपिक प्रोसीजर करने का फैसला किया।
*प्रो. (डॉ.) अनिल अरोड़ा ने आगे कहा,* “हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी इस 6 साल और 11 किलो की सबसे कम उम्र और कम वजन (हमारे अनुसार, भारत में सबसे कम उम्र एवं सबसे कम वजन के बच्चे में से एक पर पोएम इंडोस्कोपिक प्रोसीजर का सफल प्रयोग) वाली इस बच्ची में ‘स्पेशल एंडोस्कोपिक प्रोसीजर’ को करना । इतनी कमजोर और कम वजन की बच्ची में संक्रमण और सांस की समस्या का सबसे अधिक जोखिम था। पी.ओ.ई.एम.प्रोसीजर में इस्तेमाल होने वाले वयस्क एंडोस्कोपिक और सहायक उपकरण का उपयोग एक छोटे बच्चे  में करना एक जटिल कार्य था।”
*डॉ. शिवम खरे, कंसलटेंट, डिपार्टमेंट ऑफ़ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी, सर गंगा राम अस्पताल के अनुसार,* “पीओईएम प्रक्रिया में चार चरण होते हैं: (ए) म्यूकोसल एंट्री (बी) सबम्यूकोसल टनल का निर्माण, (सी) मायोटॉमी की शुरुआत और विस्तार और (डी)म्यूकोसल एंट्री को बंद करना।”
उपरोक्त चार चरणों का अर्थ है भोजन नली की आंतरिक परत कोकाटना, मांसपेशियों की परतों और भोजन की नली कीअंदरूनी परत के बीच एक रास्ता बनाना, फिर पेट और भोजन की नली केजंक्शन पर जटिल  मांसपेशियों को काटना, और अंत में आंतरिक परत को हेमोक्लिप्स के साथ बंद करना।
छोटी उम्र के बच्चों में ऐकलेज़िया कार्डिया होने की सम्भवनाये कम होती हैं और ऐकलेज़िया कार्डिया के 5 % से भी कम मरीज 15वर्ष से कम उम्र के होते हैं ।
इस ‘स्पेशल एंडोस्कोपिक प्रोसीजर को करने में  डेढ़ घंटे का समय लगा और मरीज को प्रोसीजर के बाद भोजन की नली और पेट के जंक्शन पर रुकावट से तुरंत राहत मिली ।
इस जटिल एंडोस्कोपिक प्रोसीजर को एंडोस्कोपिक असिस्टेंट, पीडियाट्रिक एनेस्थेटिस्ट और सर्जन की एक प्रशिक्षित टीम की सहायता के बिना कर पाना असंभव था। सर्जरी के 4 दिनों के भीतर बच्ची सामान्य आहार लेने लग गई और अस्पताल से छुट्टी दे दी गयी।
पेर ओरल एंडोस्कोपिक मायोटॉमी एक एंडोस्कोपिक प्रोसीजर है जिसका उपयोग भोजन की नली के निचले हिस्से में होने वाली रुकावट ऐकलेज़िया कार्डिया के इलाज के लिए किया जाता है। पोएम एक नया एंडोस्कोपिक प्रोसीजर है जिसेमें छाती या पेट पर बिना किसी चीर-फाड़ किए एण्डोस्कोप के द्वारा किया जाता है। इसमें मरीज को अस्पताल में एक से दो दिन भर्ती होने की आवश्यकता होती है।
*डॉ. शिवम खरे के अनुसार,* “हमारा मानना है कि बढ़ती विशेषज्ञताऔर मल्टीस्पेशलिटी टीम की उपलब्धता के होने के कारण इस प्रक्रिया को सुरक्षित रूप  से ऐसे असहाय और कमजोर बच्चों में  डिस्फेजिया  (निगलने में कठिनाई)  के स्थाई समाधान के लिए किया जा सकता है जिससे कि ऐसे असहाय बच्चों की  किशोरावस्था के प्रारंभिक वर्षो  में शारीरिक और मानसिक विकास की पूरी क्षमता हासिल की जा सकती है।“
*आगे विस्तार से बताते हुए, प्रो. (डॉ.) अनिल अरोड़ा ने कहा,* “अत्याधुनिक उन्नत डायग्नोस्टिक प्रोसीजर जैसे हाई रेजोल्यूशन एसोफैगल मैनोमेट्री और हाईडेफिनिशन एंडोस्कोपके साथ, ऐकलेज़िया कार्डिया जैसी बीमारी का आसानी से उपचार किया जा सकता है। हम अपने अस्पताल में अब तक 427 मरीजों में इस प्रोसीजर को सफलतापूर्वक कर चुके हैं। लेकिन भारत में पहली बार सर गंगा राम अस्पताल में  केवल 11 किलो वजन वाले 6 साल के छोटे बच्चे में यह प्रोसीजर सफलतापूर्वक किया गया है।“

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