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20 जुलाई को फालुन दाफा के चीन में दमन के तेईस वर्ष – भारत में भी मनाया गया विरोध दिवस

नई दिल्ली, 23 जुलाई 2022 (यू.टी.एन.)। मन और शरीर की साधना पद्धति फालुन दाफा का अभ्यास विश्व में 100 से अधिक देशों में 10 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा किया जा रहा है। लेकिन दुःख की बात यह है कि चीन, जो फालुन दाफा की जन्म भूमि है, वहां 20 जुलाई 1999 से इसका दमन किया जा रहा है जो आज तक जारी है। 20 जुलाई के दिन को फालुन दाफा अभ्यासी दुनियाभर में विरोध दिवस के रूप में मनाते हैं और शांतिपूर्वक प्रदर्शन और कैंडल लाइट विजिल द्वारा लोगों को चीन में हो रहे बर्बर दमन के बारे में अवगत कराते हैं।
दुनिया भर के फालुन दाफा अभ्यासियों की भांति भारत के अभ्यासियों ने भी 20 जुलाई को शांतिपूर्वक प्रदर्शन और कैंडल लाइट विजिल का आयोजन किया। बैंगलोर, मुंबई, नागपुर, हैदराबाद आदि शहरों के अभ्यासियों ने सार्वजनिक  स्थानों पर ध्यान अभ्यास और कैंडललाइट विजिल का आयोजन किया। लोगों ने चीन में फालुन दाफा अभ्यासियों के दमन के बारे में सूचना पत्रक स्वीकार किये। बहुत से लोगों ने खेद व्यक्त किया कि किसी भी देश इस तरह के अच्छे अभ्यास का दमन कैसे कर सकता है?
इस अवसर पर फालुन दाफा इंडिया फेसबुक पेज पर फालुन दाफा अभ्यास और चीन में हो रहे दमन से सम्बंधित विडियो और पोस्ट भी प्रदर्शित किये गए। एक ऑनलाइन कैंडललाइट विजिल भी आयोजित की गयी जिसमें ऑनलाइन वेबिनार से सीखने वाले नये अभ्यासियों ने भाग लिया।
प्रष्ठभूमि: 
फालुन दाफा (जिसे फालुन गोंग भी कहा जाता है) बुद्ध और ताओ विचारधारा पर आधारित एक प्राचीन साधना पद्धति है जिसे वर्तमान समय में श्री ली होंगज़ी द्वारा 1992 में चीन में सार्वजनिक किया गया। फालुन दाफा और इसके संस्थापक, श्री ली होंगज़ी को, दुनियाभर में 3000 से अधिक पुरस्कारों और प्रशस्तिपत्रों से नवाज़ा गया है। चीन में फालुन गोंग का दमन: इसके स्वास्थ्य लाभ और आध्यात्मिक शिक्षाओं के कारण फालुन गोंग चीन में इतना लोकप्रिय हुआ कि 1999 तक करीब 7 से 10 करोड़ लोग इसका अभ्यास करने लगे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की मेम्बरशिप उस समय 6 करोड़ ही थी। उस समय के चीनी शासक जियांग जेमिन ने फालुन गोंग की शांतिप्रिय प्रकृति के बावजूद इसे अपनी प्रभुसत्ता के लिए खतरा माना और 20 जुलाई 1999 को इस पर पाबंदी लगा कर कुछ ही महीनों में इसे जड़ से उखाड़ देने की मुहीम चला दी। पिछले 23 वर्षों से फालुन गोंग अभ्यासियों को चीन में यातना, हत्या, ब्रेनवाश, कारावास, बलात्कार, जबरन मज़दूरी, दुष्प्रचार, निंदा, लूटपाट, और आर्थिक अभाव का सामना करना पड रहा है।
अत्याचार की दायरा बहुत बड़ा है और मानवाधिकार संगठनों द्वारा दर्ज़ किए गए मामलों की संख्या दसियों हजारों में है।
यह भारत के लिए प्रासंगिक क्यों है: पिछले कुछ समय से भारत और चीन के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। भारत पर दबाव बनाने के लिये चीन मसूद अजहर समर्थन, अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख बॉर्डर विवाद आदि का इस्तेमाल करता रहा है। भारत के कड़े रुख और इसके बाद चीनी सामान के बायकाट की मुहीम ने चीन को भारत की ताकत का अंदाजा लगा दिया है। किंतु चीन स्वयं आज एक दोराहे पर खड़ा है। एक ओर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी है जिसका इतिहास झूठ, छल और धोखाधड़ी का रहा है। दूसरी ओर वहां लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की आवाजें उठ रही हैं। भारत के पास चीन को सिखाने के लिये बहुत कुछ है। भारत को चीन में तिब्बत बोद्ध, वीगर मुस्लिम और फालुन गोंग पर हो रहे घोर मानवाधिकार अपराधों की निंदा करनी चाहिए। यही सोच भारत को विश्वगुरु का दर्जा दिला सकती है।

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